देश

अवैध निर्माणों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, राज्यों को अपनी नीति बनाने का निर्देश

नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को देशभर में लंबे समय से मौजूद अनधिकृत और अवैध निर्माणों के रेगुलराइजेशन और डिमोलशन के लिए एक समान नीति बनाने की मांग पर सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को अपने स्तर पर विचार करने को कहा। हालांकि, अदालत ने जनहित याचिका पर कोई निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह मुख्य रूप से राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों के नीतिगत अधिकार क्षेत्र का विषय है।

  • चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि अलग-अलग राज्यों की परिस्थितियां और जमीनी वास्तविकताएं काफी अलग हैं।
  • ऐसे में पूरे देश के लिए एक समान नीति तय करना न तो व्यावहारिक होगा और न ही उचित।
  • पीठ ने उम्मीद जताई कि राज्य और केंद्रशासित प्रदेश नई नीतियां बनाते समय या मौजूदा नीतियों की समीक्षा करते समय याचिका में उठाए मुद्दों पर उचित विचार करेंगे।
  • यह याचिका सेंटर फॉर लॉ एंड गुड गवर्नेंस ने दाखिल की थी।
  • इसमें खासकर गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लंबे समय से बने अनधिकृत आवासों को अचानक ध्वस्त किए जाने से बचाने के लिए नीति बनाने की मांग की गई थी।
  • याचिकाकर्ता ने कहा कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और दिल्ली जैसे राज्यों में अनधिकृत बस्तियों और निर्माणों के नियमितीकरण की योजनाएं हैं, लेकिन कई जगह बिना पर्याप्त नोटिस के ध्वस्तीकरण कर दिया जाता है।
  • प्रभावित परिवारों के पुनर्वास या वैकल्पिक आवास की व्यवस्था भी कई मामलों में नहीं होती। ध्वस्तीकरण कठोर कदम है।

ध्वस्तीकरण से पहले 15 दिन का नोटिस
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, सुप्रीम कोर्ट पहले ही अवैध और अनधिकृत ध्वस्तीकरण के खिलाफ सुरक्षा उपाय तय कर चुका है। अनधिकृत कब्जाधारी को भी ध्वस्तीकरण से पहले 15 दिन का नोटिस दिया जाना चाहिए। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा, याचिका में उठाए मुद्दों का समाधान हर मामले की परिस्थितियों के आधार पर किया जाना होगा। कोई समिति राज्य सरकारों और नगर निकायों को कानून लागू करने के अधिकारों का स्थान नहीं ले सकती।

प्रभावित परिवारों की चिंता भी समझनी होगी
कोर्ट ने कहा, नीति बनाने का अधिकार राज्यों के पास है। हालांकि, किसी राज्य की नीति मनमानी हो या प्रक्रिया का पालन न किया गया हो तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। प्रभावित परिवारों के आवास के अधिकार की चिंता को भी समझना होगा, लेकिन परिस्थितियां राज्य-दर-राज्य अलग हो सकती हैं। अदालत ने याचिकाकर्ता को केंद्र, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के समक्ष याचिका रखकर नई नीति बनाने या मौजूदा नीतियों की समीक्षा का आग्रह करने की स्वतंत्रता दी।

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button