पॉलिटिकल

वंदे मातरम विवाद: कांग्रेस बैकफुट पर, चुप्पी से अल्पसंख्यक नेता नाराज, भाजपा का आक्रामक रुख

इंदौर 

इंदौर के नगर निगम सम्मेलन में ‘वंदे मातरम्’ विवाद से राजनीति गरमा गई है। कांग्रेस के दो पार्षदों द्वारा ‘वंदे मातरम्’ नहीं गाए जाने और विवादित बयान देने पर कांग्रेस ने पल्ला झाड़ लिया है। कांग्रेस नेताओं ने दोनों महिला पार्षदों का बचाव नहीं किया। इससे कांग्रेस पार्टी के अन्य अल्पसंख्यक नेता नाराज़ हो गए हैं। इस पूरे मामले में कांग्रेस बैकफुट पर नज़र आ रही है, जबकि भाजपा अब इस मुद्दे पर कांग्रेस को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। शुक्रवार को इंदौर के कई वार्डों में भाजपा कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस के पुतले जलाए और ‘वंदे मातरम्’ गीत गाया।

विवाद सामने आने के बाद इंदौर शहर कांग्रेस ने सभी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ गीत अनिवार्य कर दिया है। पार्षद रुबीना इक़बाल के खिलाफ निष्कासन का प्रस्ताव भी भोपाल भेज दिया गया है। उधर, इस मामले में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भी चुप्पी साध रखी है। छतरपुर दौरे में मीडियाकर्मियों ने जब उनसे इस मामले में सवाल पूछा, तो पटवारी ने हाथ जोड़ लिए और बिना कुछ बोले आगे बढ़ गए।
 
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ‘वंदे मातरम्’ जैसे मुद्दे पर चुप्पी साधना कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है, खासकर तब जब विपक्ष इसे राष्ट्रवाद से जोड़कर बड़ा मुद्दा बना रहा है। फिलहाल, जीतू पटवारी की इस चुप्पी को लेकर सियासी गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। अब देखना होगा कि कांग्रेस इस विवाद पर आधिकारिक रूप से क्या रुख अपनाती है। 

कांग्रेस नेता अमीनुल खान सूरी ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ गाने से उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन उनकी आपत्ति शहर कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा इसे कार्यक्रमों में अनिवार्य किए जाने पर है। उन्होंने कहा, “हम कांग्रेस में उसकी विचारधारा से जुड़े हैं। सबसे पहले ‘वंदे मातरम्’ कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था। इसे इस तरह अनिवार्य करना अनुचित है। देशभक्ति कोई आदेश नहीं, बल्कि एक एहसास है।

निगम सभापति ने संभाग आयुक्त को लिखा पत्र
इंदौर निगम सभापति मुन्नालाल यादव ने भी संभागयुक्त को पत्र लिखकर दोनों पार्षदों को पद से हटाने और केस दर्ज कराने की मांग की। पार्षदों की इस हरकत के खिलाफ खेल मंत्री विश्वास सारंग भी कूद पड़े। उन्होंने मीडिया से कहा, हिंदुस्तान में रहना है तो वंदे मातरम् गाना ही होगा। सारंग ने कहा, यह गीत धर्म विशेष का नहीं है। राष्ट्र भावना का प्रतिनिधित्व करता है। जो मातृभूमि की इज्जत नहीं करता उसे जीने का अधिकार नहीं। वो पाकिस्तान चले जाएं।

'गाएं न गाएं, अपमान नहीं होना चाहिए'
एडवोकेट अभिनव धनोतकर ने बताया, केंद्र सरकार ने सर्कुलर जारी कर सभी संस्थानों और कार्यक्रमों में वंदेमातरम् गायन अनिवार्य किया था। इस पर एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर को निराकृत कर कहा था कि वंदेमातरम् गायन में आप शामिल हों या न हों। आपकी इच्छा पर है। लेकिन अपमान नहीं होना चाहिए।

कांग्रेस में मतभेद
वंदे मातरम् विवाद पर कांग्रेस में भी मतभेद खुलकर सामने आए हैं। कांग्रेस नेता केके मिश्रा ने इसे राजनीतिक ब्लैकमेलिंग बताया, छत्तीसगढ़ अल्पसंख्यक विभाग के प्रभारी अमीनुल खान सूरी ने कहा कि दोनों पार्षदों की बात का तरीका गलत था, लेकिन वंदे मातरम की अनिवार्यता का आदेश उचित नहीं है। सूरी ने मामले में कांग्रेस शहर अध्यक्ष चिंटू चौकसे के फैसले पर भी सवाल उठाए।

जानें मुस्लिम क्यों करते हैं राष्ट्रगीत गाने का विरोध
राष्ट्रगीत का अर्थ:
'वंदे' का अर्थ वंदना या पूजा करना है। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, सजदा या वंदना केवल अल्लाह के सामने ही की जा सकती है, किसी और के सामने नहीं।

मूर्ति पूजा का निषेध: इस गीत में मातृभूमि को मां दुर्गा या देवी के रूप में चित्रित किया गया है, जो इस्लाम के एकेश्वरवाद (एक ही ईश्वर) के सिद्धांत के विरुद्ध है।

विकल्प भी: मुसलमान अपनी मातृभूमि के प्रति सम्मान और प्रेम को 'मादरे वतन जिंदाबाद' (मातृभूमि की जय) कहकर व्यक्त करते हैं।

इतिहास में भी दर्ज है विरोध: 1937 में भी मौलाना अबुल कलाम आजाद और अन्य मुस्लिम विद्वानों ने इसके कुछ अंशों को अपनी आस्था के खिलाफ बताते हुए इसका विरोध जताया था

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button