छत्‍तीसगढ़

आम तोड़ने की ‘सजा’: 12 साल के मासूम को गार्ड ने बेरहमी से पीटा

बलौदाबाजार

एक आम तोड़ने की मामूली-सी बात ने ऐसी दर्दनाक तस्वीर सामने ला दी, जिसने इंसानियत को झकझोर दिया है। 12 वर्षीय दिनेश्वर साहू, जो बचपन की सहज शरारत में निजी सीमेंट कंपनी परिसर से आम तोड़ रहा था, उसे इस कदर सजा दी गई कि वह गंभीर रूप से घायल हो गया।

शनिवार शाम करीब साढ़े पांच बजे की घटना में निजी सीमेंट कंपनी रवान के एक सुरक्षा गार्ड ने बच्चे को पकड़कर बेरहमी से जमीन पर पटक-पटक कर पीटा। मासूम का शरीर इस बर्बरता को सह नहीं सका—हड्डियों और अंदरूनी अंगों को गंभीर चोटें आईं, शरीर पर खून के निशान और खरोंच साफ नजर आए। घटना के बाद बच्चा करीब 24 घंटे तक बेहोश रहा, जिसकी हालत बेहद नाजुक बनी रही। फिलहाल उसका इलाज जिला अस्पताल में जारी है।

परिजनों के अनुसार, घटना के बाद मामला और भी भयावह हो गया जब कुछ लोगों ने उन्हें रिपोर्ट दर्ज न कराने के लिए डराया-धमकाया। गाली-गलौज और “बुरा अंजाम भुगतने” की चेतावनी देकर दबाव बनाया गया। लेकिन समाज और ग्रामीणों के साथ आने के बाद परिवार ने हिम्मत जुटाई और थाने में शिकायत दर्ज कराई।

इस घटना ने पूरे इलाके में आक्रोश फैला दिया है। जिला साहू संघ के पदाधिकारी अस्पताल पहुंचे और बच्चे का हाल जाना। संघ के अध्यक्ष सुनील साहू ने इसे “अमानवीय और शर्मनाक” बताते हुए कहा कि एक मासूम के साथ ऐसी क्रूरता किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने आरोपी गार्ड समेत दबाव बनाने वालों पर सख्त कार्रवाई की मांग की और चेतावनी दी कि न्याय नहीं मिला तो आंदोलन किया जाएगा।

संरक्षक रेवाराम साहू ने भी सवाल उठाया—“आम तोड़ना क्या इतना बड़ा अपराध है कि बच्चे को मौत के मुंह में धकेल दिया जाए?” उन्होंने इसे गुंडागर्दी करार देते हुए कठोर कार्रवाई की जरूरत बताई।

मामले की गंभीरता को देखते हुए कसडोल विधायक संदीप साहू और जिला कांग्रेस अध्यक्ष सुमित्रा घृतलहरे भी अस्पताल पहुंचे और पीड़ित से मुलाकात कर पुलिस अधिकारियों से सख्त कार्रवाई की मांग की।

ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि इससे पहले भी कंपनी से जुड़े लोगों द्वारा एक अन्य बच्चे के साथ मारपीट हुई थी, जिसकी बाद में मौत हो गई थी। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाएं सुरक्षा और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।

फिलहाल पुलिस ने एक गार्ड को गिरफ्तार कर लिया है और अन्य आरोपियों की जांच जारी है। लेकिन सवाल अब भी वही है—क्या एक आम की कीमत एक मासूम की जान से ज्यादा हो सकती है?

 

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