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कांग्रेस बंगाल की सभी सीटों पर ममता के खिलाफ अकेले लड़ेगी चुनाव, लेकिन क्या होगा उसका एजेंडा?

कलकत्ता 

पश्चिम बंगाल में विधानसभा के चुनाव अप्रैल-मई में होने वाले हैं. लेकिन, अभी से ही संकेत मिलने लगे हैं कि बंगाल की लड़ाई भी लगभग दिल्ली और बिहार जैसी ही हो सकती है – बंगाल में भी कांग्रेस करीब करीब उसी भूमिका में नजर आ सकती है, जैसा कांग्रेस का रवैया दिल्ली और बिहार में देखा जा चुका है.

पश्चिम बंगाल में चल रहे SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण के खिलाफ अपनी मुहिम को धार देने के लिए ममता बनर्जी दिल्ली में हैं. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मिल चुकी हैं, और सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की बेंच के सामने अपने केस की पैरवी भी कर चुकी हैं.

साथ ही, ममता बनर्जी चाहती हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कांग्रेस संसद में महाभियोग का प्रस्ताव लाए, और तृणमूल कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दल उसको सपोर्ट करें – लेकिन, सपोर्ट के बदले में वो कुछ भी शेयर नहीं करना चाहती हैं. 

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो पहले से ही तृणमूल कांग्रेस के पश्चिम बंगाल चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान कर रखा है. अब तो कांग्रेस ने भी पश्चिम बंगाल की सभी 294 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है – ऐसी सूरत में बंगाल के चुनाव नतीजे दिल्ली और बिहार से कितने अलग होंगे, देखना महत्वपूर्ण होगा.

पश्चिम बंगाल की संभावित चुनावी जंग

ये तो अब पूरी तरह साफ हो गया है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को चुनावी लड़ाई सिर्फ बीजेपी के खिलाफ नहीं लड़ना है. 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी बहुत ज्यादा सीटें तो नहीं जीत पाई थी, लेकिन मुख्य विपक्षी दल तो बन ही गई. कांग्रेस का तो खाता भी नहीं खुल पाया था. 

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग के मुद्दे पर विपक्ष का साथ चाह रहीं ममता बनर्जी से दिल्ली में जब कांग्रेस के बारे पूछा गया तो उनका जवाब था कि उनकी पार्टी विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी. कांग्रेस के साथ किसी भी तरह के चुनावी गठबंधन की संभावना को नकारते हुए ममता बनर्जी पहले भी कह चुकी हैं, तृणमूल कांग्रेस की रणनीति साफ है, जबकि बाकी पार्टियां टीएमसी के खिलाफ लड़ने की रणनीति बनाती हैं.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर अब कांग्रेस का रुख भी सामने आ गया है. कांग्रेस का कहना है, प्रदेश संगठन और कार्यकर्ताओं की लंबे समय से मांग रही है कि पार्टी राज्य में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान के साथ चुनावी मैदान में उतरे. पश्चिम बंगाल कांग्रेस ने आलाकमान के प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा है कि केंद्रीय नेतृत्व ने बंगाल कांग्रेस की भावनाओं का सम्मान किया और अकेले चुनाव लड़ने के फैसले को मंजूरी दी.

बंगाल कांग्रेस की तरफ से एक बयान में कहा गया है, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, पश्चिम बंगाल प्रभारी गुलाम अहमद मीर, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी, सांसद ईशा खान चौधरी सहित सूबे के सीनियर नेताओं की मौजूदगी में व्यापक विमर्श हुआ – और तय हुआ कि पार्टी 2026 का विधानसभा चुनाव अकेले दम पर लड़ेगी.

बीजेपी के खिलाफ ममता बनर्जी की लड़ाई में कांग्रेस की ही तरह एक और मोर्चा खड़ा हो रहा है. सीपीएम की पश्चिम बंगाल इकाई के सचिव मोहम्मद सलीम ने हाल ही में टीएमसी से सस्पेंड विधायक हुमायूं कबीर से मुलाकात की थी. मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनवाने की घोषणा करके चर्चा में आए हुमायूं कबीर ने जनता उन्नयन पार्टी बनाई है, और ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल करने का दावा कर रहे हैं. 

बंगाल चुनाव में कांग्रेस की भूमिका

2025 के शुरू में दिल्ली विधानसभा चुनाव और आखिर में बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही. पश्चिम बंगाल के 2021 के चुनाव में तो राहुल गांधी की भूमिका रस्मअदायगी जैसी थी. राहुल गांधी एक दिन के लिए पश्चिम बंगाल में कैंपेन करने गए थे, और कोविड के कारण आगे के कार्यक्रम रद्द कर दिए गए थे. 

2025 के पश्चिम बंगाल चुनाव में कांग्रेस की भूमिका का अंदाजा कैसे लगाया जाए? क्या राहुल गांधी दिल्ली और बिहार की तरह बंगाल में भी कांग्रेस को चुनाव लड़ाने वाले हैं या 2021 की ही तरह रस्मअदायगी निभाने की तैयारी है? 

दिल्ली में हुई कांग्रेस की मीटिंग में ममता बनर्जी के सबसे बड़े विरोधी अधीर रंजन चौधरी भी शामिल थे, जो 2024 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद से हाशिये पर भेजे जा चुके हैं. और, ये भी ममता बनर्जी के फेवर में ही जाता है. 2024 के चुनाव से पहले ही ममता बनर्जी ने घोषणा कर डाली थी कि वो अकेले चुनाव लड़ेंगी. पहले तो सुनने में आया था कि वो कांग्रेस को दो सीटें गठबंधन के तहत देने के तैयार भी थीं, लेकिन बाद में मना कर दिया. और, भारत जोड़ो न्याय यात्रा के साथ राहुल गांधी के पश्चिम बंगाल में प्रवेश की पूर्व संध्या पर ही 'एकला चलो रे' घोषणा कर दी थी. फिर कांग्रेस नेतृत्व की तरफ से ममता बनर्जी के प्रति बयानों में सम्मान के भाव ही प्रकट किए जा रहे थे. 

दिल्ली और बिहार चुनावों में राहुल गांधी के तेवर को देखें तो अंदाज बिल्कुल अलग था. दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल के खिलाफ राहुल गांधी उतने ही आक्रामक नजर आते थे, जितना बीजेपी के नेता. शीशमहल से लेकर दिल्ली शराब घोटाले तक, राहुल गांधी ने एक एक मामला गिनाकर अरविंद केजरीवाल को कठघरे में खड़ा कर दिया था. 

ये भी था कि अरविंद केजरीवाल का भी कांग्रेस के प्रति ममता बनर्जी जैसा ही रवैया था. ममता बनर्जी ने तो विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक में रहते हुए भी अरविंद केजरीवाल का समर्थन किया था. मतलब, कांग्रेस के खिलाफ. जैसे समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव ने चुनाव कैंपेन भी किया था. 

बिहार चुनाव राहुल गांधी दिल्ली की तरह तो नहीं लड़ रहे थे, लेकिन कोई कमी भी नहीं छोड़ी थी. आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के साथ वोटर अधिकार यात्रा करते हुए उनको मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं बताया. तेजस्वी यादव के बड़े भाई और प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बता देने के बाद भी. बाद में जो हुआ, न होता तो भी नतीजे शायद ही अलग होते. 

तृणमूल कांग्रेस के लिए बंगाल का किला कितना मजबूत

2016 में 3 सीटें जीतने वाली बीजेपी को ममता बनर्जी ने प्रशांत किशोर की बदौलत 100 का आंकड़ा भले ही पार न करने दिया हो, लेकिन 77 सीटें जीतने से नहीं रोक सकीं. नंदीग्राम के संग्राम में अपने ही पुराने सहयोगी शुभेंदु अधिकारी के हाथों हार का मुंह तक देखना पड़ा था. 2016 में टीएमसी को 211 सीटें मिली थीं, जबकि हद से ज्यादा प्रतिकूल परिस्थितियों में भी पांच साल बाद अपना प्रदर्शन सुधारते हुए टीएमसी 215 सीटें जीतने में कामयाब रही. 2011 में जब पहली बार लेफ्ट मोर्चा को बेदखल कर ममता बनर्जी ने सत्ता हासिल की थी, तो 184 सीटें मिली थीं. तब कांग्रेस का भी सपोर्ट हासिल था, लेकिन अब आमने सामने की टक्कर होने वाली है. 

पश्चिम बंगाल में अभी जो राजनीतिक समीकरण बनते दिखाई पड़ रहे हैं, कुछ चीजें तो पूरी तरह साफ हैं. कुछ तस्वीरें तो हमेशा ही धुंधली रहती हैं.

1. मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की कोशिश, ममता बनर्जी की तरफ से फिजूल की कवायद है. हो सकता है, इसे प्रचारित करके ममता बनर्जी वैसे ही फायदा उठाने की कोशिश करें जैसे बंगाल के लोगों के लिए SIR के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाकर पैरवी करने का वादा पूरा करने जैसा.  

2. अगर ममता बनर्जी भी अरविंद केजरीवाल और तेजस्वी यादव जैसा व्यवहार करेंगी, और राहुल गांधी का रवैया दिल्ली और बिहार जैसा ही रहेगा, तो नतीजे अलग कैसे होंगे? 

3. ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल में 'एकला चलो…' की जिद के कारण कांग्रेस के पैंतरे दिल्ली और बिहार जैसा 'खेला' कर सकते हैं.
 
4. फिर तो दिल्ली और बिहार की तरह पश्चिम बंगाल में भी बीजेपी को बड़े आराम से खुला मैदान मिल सकता है. 

 

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